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यूसीएलए की नई रिसर्च: क्रिएटिन सिर्फ मसल्स नहीं, कैंसर से लड़ने में भी मददगार

नई दिल्ली/लॉस एंजेलिस: जिम में मसल्स बनाने के लिए मशहूर सप्लीमेंट क्रिएटिन अब कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भी एक नया हथियार साबित हो सकता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेलिस (UCLA) की हालिया स्टडी में पाया गया है कि क्रिएटिन हमारी इम्यून सिस्टम की किलर टी-सेल्स (Killer T-cells) और डेंड्रिटिक सेल्स (Dendritic Cells) को ऊर्जा देकर ट्यूमर को सिकोड़ने और लड़ने में मदद करता है।

यह खबर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जहां एक पोस्ट में इसे “Cancer-fighting powerhouse” कहा गया है। लेकिन असली कहानी क्या है? आइए विस्तार से समझते हैं।

क्रिएटिन क्या है और यह कैसे काम करता है?

क्रिएटिन एक प्राकृतिक यौगिक है जो हमारे शरीर में मुख्य रूप से मांसपेशियों में स्टोर रहता है। यह ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) के रूप में ऊर्जा का “मॉलिक्यूलर बैटरी” की तरह काम करता है। एथलीट्स इसे सप्लीमेंट के रूप में लेते हैं ताकि तीव्र व्यायाम के दौरान ऊर्जा जल्दी उपलब्ध हो।

UCLA की स्टडी के अनुसार, कैंसर के ट्यूमर वाले माहौल (ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट) में टी-सेल्स बहुत थक जाती हैं क्योंकि वहां पोषक तत्व और ऊर्जा की कमी होती है। क्रिएटिन इन सेल्स को “गैस” (ऊर्जा) सप्लाई करके उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखता है।

स्टडी में क्या पाया गया? (UCLA रिसर्च डिटेल्स)

UCLA की प्रोफेसर Lili Yang के लैब ने दो मुख्य खोजें कीं:

1. 2019 की पुरानी स्टडी: क्रिएटिन टी-सेल्स (CD8+ Killer T-cells) को सीधे पावर देता है। क्रिएटिन ट्रांसपोर्टर (CrT) को ब्लॉक करने पर टी-सेल्स ट्यूमर से नहीं लड़ पातीं। माउस मॉडल में क्रिएटिन देने से ट्यूमर ग्रोथ कम हुई।

2. 2026 की नई स्टडी (iScience जर्नल): अब पता चला कि क्रिएटिन सिर्फ टी-सेल्स को नहीं, बल्कि डेंड्रिटिक सेल्स को भी सपोर्ट करता है। डेंड्रिटिक सेल्स ट्यूमर के टुकड़ों को पहचानकर टी-सेल्स को “ट्रेन” और एक्टिवेट करती हैं। ट्यूमर के अंदर ये सेल्स क्रिएटिन ज्यादा लेती हैं और इससे उनकी सर्वाइवल, एक्टिवेशन और टी-सेल्स को प्राइम करने की क्षमता बढ़ जाती है।

मुख्य नतीजे (माउस मॉडल और ह्यूमन सेल्स में):

क्रिएटिन सप्लीमेंटेशन से ट्यूमर ग्रोथ काफी धीमी हुई।

ट्यूमर के अंदर डेंड्रिटिक सेल्स और एक्टिवेटेड टी-सेल्स की संख्या बढ़ी।

ह्यूमन डेंड्रिटिक सेल्स (स्वस्थ डोनर्स से) पर टेस्ट में भी क्रिएटिन ने एक्टिवेशन बढ़ाया और टी-सेल्स को बेहतर तरीके से प्राइम किया।

यह स्टडी iScience जर्नल में प्रकाशित हुई है (2026)।

इससे पहले की रिसर्च क्या कहती है?

2021 की एक रिव्यू (Nutrients जर्नल) में भी क्रिएटिन को टी-सेल एंटी-ट्यूमर एक्टिविटी बढ़ाने वाला बताया गया था।

क्रिएटिन PD-1/PD-L1 इम्यूनोथेरेपी (जैसे चेकपॉइंट इनहिबिटर्स) के साथ मिलकर और बेहतर काम करता है।

क्या इसका मतलब है कि हर कोई क्रिएटिन ले ले?

नहीं। यह अभी प्री-क्लिनिकल स्टडी (मुख्य रूप से माउस और लैब सेल्स) पर आधारित है। इंसानों में बड़े क्लिनिकल ट्रायल्स की जरूरत है। UCLA के शोधकर्ताओं का कहना है कि क्रिएटिन इम्यूनोथेरेपी को सपोर्ट कर सकता है, लेकिन डॉक्टर की सलाह के बिना इसे कैंसर ट्रीटमेंट के रूप में इस्तेमाल न करें।

साइड इफेक्ट्स: सामान्य डोज में क्रिएटिन सुरक्षित माना जाता है, लेकिन किडनी की समस्या वाले लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।

निष्कर्ष: एक रोमांचक संभावना

UCLA की यह रिसर्च दिखाती है कि क्रिएटिन इम्यून सिस्टम की पूरी “इंफ्रास्ट्रक्चर” (डेंड्रिटिक + टी-सेल्स) को एनर्जाइज कर सकता है। अगर बड़े ट्रायल्स में यह सफल रहा तो यह सस्ता, आसानी से उपलब्ध सप्लीमेंट कैंसर मरीजों की मदद कर सकता है, खासकर इम्यूनोथेरेपी के साथ।

सोर्सेज: UCLA Newsroom, iScience जर्नल, ScienceDaily, और संबंधित पब्लिश्ड पेपर्स।

नोट: यह आर्टिकल उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित है। कैंसर से संबंधित कोई भी सप्लीमेंट या बदलाव डॉक्टर या ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह लेकर ही अपनाएं। रिसर्च जारी है और भविष्य में और ज्यादा डेटा सामने आएगा।

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