(जीवन दिशा न्यूज़)। भारतीय कानून में पुलिस द्वारा बल प्रयोग की शक्ति निरपेक्ष नहीं है, बल्कि सख्ती से नियंत्रित है। ‘लर्न विथ लेक्स’ सीरीज के तहत जारी जानकारी के अनुसार, गिरफ्तारी या भागने को रोकने के लिए केवल उचित और आवश्यक बल ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43 (पहले CrPC की धारा 46) के तहत पुलिस को गिरफ्तारी के दौरान उचित बल प्रयोग करने का अधिकार है, लेकिन यह बल आनुपातिक होना चाहिए। कानून साफ कहता है कि बल न तो अत्यधिक हो सकता है, न सजा देने वाला और न ही गुस्से से प्रेरित।
अक्सर देखा जाता है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस अधिकारी अपनी सत्ता का दुरुपयोग करते हैं। हिरासत में मारपीट और शारीरिक यातनाएं इस समस्या को बार-बार उजागर करती हैं। कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, गिरफ्तारी या जांच के चरण में किसी भी प्रकार की सजा देना या यातना देना पूरी तरह अवैध है। प्रक्रिया से किसी भी तरह का विचलन गंभीर कानूनी परिणामों को आमंत्रित कर सकता है।
कबूलनामा उगलवाने के लिए यातना देना गंभीर अपराध
कानून और भी सख्त हो जाता है जब बल का इस्तेमाल किसी व्यक्ति से कबूलनामा उगलवाने के लिए किया जाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 120 (पहले IPC की धारा 330 और 331) के तहत, किसी से कबूलनामा हासिल करने के लिए चोट पहुंचाना या गंभीर चोट पहुंचाना खुद में दंडनीय अपराध है।
यह न सिर्फ दंड संहिता का उल्लंघन है, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का भी सीधा उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है तथा यातना और अमानवीय व्यवहार से सुरक्षा प्रदान करता है।
कानूनी स्थिति स्पष्ट है
कानूनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है। पुलिस की अधिकारिता बिना रोक-टोक वाली हिंसा तक नहीं फैली हुई है। कानूनी जरूरत से परे किसी भी बल का प्रयोग प्रवर्तन से दुरुपयोग में बदल जाता है। कानून ऐसे कृत्यों के लिए जवाबदेही तय करता है और यह सिद्ध करता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर हो, कानून से ऊपर नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस अधिकारियों को अपने अधिकारों की सीमाओं के बारे में लगातार जागरूक किया जाना चाहिए ताकि नागरिक अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित हो सके और कानून का शासन मजबूत रहे।
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