(जीवन दिशा न्यूज़): झारखंड हाई कोर्ट ने जनवरी 2026 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि विवाह से पहले किसी पूर्व लिव-इन रिलेशनशिप को छुपाना धोखाधड़ी (फ्रॉड) माना जाएगा। कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 12(1)(c) के तहत विवाह को रद्द (annulment) करने का फैसला बरकरार रखा।
कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस गौतम कुमार चौधरी) ने बोकारो की फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही ठहराया। मामला इस प्रकार था कि पति ने शादी से पहले अपनी पूर्व लिव-इन पार्टनर के बारे में पत्नी को नहीं बताया, जिसे कोर्ट ने महत्वपूर्ण तथ्य (मटेरियल फैक्ट) की छुपाई माना। इससे पत्नी की सहमति धोखे से ली गई थी, जो विवाह की नींव – विश्वास और सूचित सहमति – को तोड़ता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह एक पवित्र संस्कार है, लेकिन धोखे से ली गई सहमति को कानून की सुरक्षा नहीं मिल सकती। ऐसे छुपाव से विवाह रद्द करने योग्य (voidable) हो जाता है।
एलिमनी में बढ़ोतरी
फैमिली कोर्ट ने पहले पत्नी को 30 लाख रुपये की स्थायी एलिमनी (permanent alimony) देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने इसे अपर्याप्त मानते हुए इसे बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया। यह राशि एकमुश्त (one-time settlement) के रूप में पांच समान मासिक किस्तों में फरवरी से जून 2026 तक चुकाई जाएगी।
यह फैसला पारदर्शिता और विश्वास पर जोर देता है। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत इतिहास, खासकर पूर्व संबंधों की जानकारी, विवाह की वैध सहमति के लिए आवश्यक है।
यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो विवाह में पूर्ण ईमानदारी बरतने की जरूरत पर बल देता है। यदि आप या आपके कोई परिचित ऐसी स्थिति में हैं, तो कानूनी सलाह लें।
(स्रोत: झारखंड हाई कोर्ट का जनवरी 2026 का फैसला और विभिन्न कानूनी रिपोर्ट्स)
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