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अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स दिमाग को ‘हाईजैक’ करते हैं: चिप्स-बिस्किट की लत सिगरेट जैसी, अब तंबाकू जैसी सख्त रेगुलेशन की मांग

(जीवन दिशा न्यूज़): अगर आप चिप्स, बिस्किट या कोई पैकेटेड स्नैक खोलते ही पूरा पैकेट खत्म किए बिना रुक नहीं पाते, तो यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं—यह दिमाग की एक वैज्ञानिक चाल है। हालिया अंतरराष्ट्रीय रिसर्च (2025-2026) में साबित हुआ है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPFs) जैसे चिप्स, कुकीज, सोडा और फास्ट फूड हमारे ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम को “हाईजैक” कर लेते हैं। ये फूड्स डोपामाइन का इतना तेज उछाल पैदा करते हैं कि क्रेविंग, कंपल्सिव ईटिंग (बिना रुके खाना) और नुकसान होने के बावजूद जारी रखना जैसी आदतें बन जाती हैं—ठीक वैसे ही जैसे सिगरेट या कोकेन में होता है।

नई स्टडीज का खुलासा: लत क्लिनिकल स्तर पर साबित

  यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की प्रोफेसर एशली गियरहार्ड्ट की Nature Medicine में प्रकाशित लैंडमार्क स्टडी (2025) में 36 देशों की 300 से ज्यादा रिसर्च का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि UPFs ब्रेन के रिवॉर्ड सर्किट को ड्रग्स की तरह प्रभावित करते हैं, खासकर स्ट्रिएटम में डोपामाइन बढ़ाकर। न्यूरोइमेजिंग से साबित हुआ कि compulsive खाने वाले लोगों में ब्रेन सर्किट अल्कोहल और कोकेन एडिक्शन जैसा डिसरप्ट होता है।

  Pharmacological Research (फरवरी 2026) में प्रकाशित रिव्यू में कहा गया कि रिफाइंड शुगर और सैचुरेटेड फैट से भरपूर UPFs substance use disorders जैसी neurobiological responses ट्रिगर करते हैं।

  Milbank Quarterly (फरवरी 2026) की स्टडी में UPFs को तंबाकू इंडस्ट्री से तुलना की गई—दोनों ही प्रोडक्ट्स को “इंजीनियर” किया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा खाए/पीए जाएं। डोपामाइन रिस्पॉन्स निकोटिन जितना मजबूत (150-200%) होता है।

एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 14% वयस्क और 12% बच्चे UPFs की लत के क्लिनिकल क्राइटेरिया पूरा करते हैं। ये फूड्स ओवरईटिंग बढ़ाते हैं, डिप्रेशन-एंग्जायटी का रिस्क 53% तक बढ़ाते हैं, मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और यहां तक कि ब्रेन डेवलपमेंट पर लंबे समय का असर डालते हैं।

तंबाकू जैसी रेगुलेशन की मांग तेज: Big Food पर लगाम लगे

विशेषज्ञ अब कह रहे हैं कि UPFs को फल-सब्जियों की तरह नहीं, बल्कि सिगरेट जैसा ट्रीट किया जाए। The Guardian, PsyPost और Milbank Quarterly की हालिया रिपोर्ट्स में सुझाव दिए गए हैं:

  बच्चों पर मार्केटिंग पर सख्त रोक

  पैकेट्स पर हेल्थ वॉर्निंग लेबल (“अधिक खाने से लत लग सकती है”)

  टैक्स बढ़ाना और कीमतें ऊंची करना

  स्कूलों, अस्पतालों में बिक्री पर पाबंदी

  उत्पादन में शुगर-फैट-नमक की सख्त लिमिट

ये कदम इसलिए जरूरी क्योंकि फूड इंडस्ट्री तंबाकू कंपनियों की तरह “ब्लिस पॉइंट” (चीनी-नमक-फैट का परफेक्ट मिश्रण) बनाकर लत पैदा करती है।

छोटे बदलाव से बचाव: अपनी प्लेट पर कंट्रोल लें

एक्सपर्ट्स की सलाह है:

  पैकेज्ड फूड्स कम करें, ताजा फल-सब्जियां और घर का संतुलित खाना अपनाएं।

  खाने से पहले सोचें—यह भूख है या क्रेविंग?

  छोटे हिस्से में पैकेट खोलें और धीरे-धीरे खाएं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का संदेश साफ है: “अपनी प्लेट पर कंट्रोल रखें, इससे पहले कि Big Food आपके दिमाग पर कंट्रोल कर ले!” अगर पैकेट खोलते ही रोकना मुश्किल लगता है, तो याद रखें—यह आपकी कमजोरी नहीं, इंडस्ट्री की डिजाइन है। समय है जागरूक होने और स्वस्थ आदतें अपनाने का।

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