पुलिस स्टेशन में वीडियो रिकॉर्डिंग: कानून क्या कहता है? नागरिकों के अधिकार और बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

(जीवन दिशा न्यूज़) क्या आप पुलिस स्टेशन के अंदर अपना मोबाइल निकालकर वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं? यह सवाल लाखों नागरिकों के मन में आता है, खासकर जब शिकायत दर्ज कराने, बयान देने या कोई विवाद हो।

जवाब है — हाँ, आप रिकॉर्डिंग कर सकते हैं। यह कोई अपराध नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) ने साफ-साफ कहा है कि पुलिस स्टेशन ‘निषिद्ध स्थान’ (Prohibited Place) नहीं है। इसलिए ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट 1923 की धारा 3 (जासूसी का आरोप) पुलिस स्टेशन में वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग पर लागू नहीं होती।

महत्वपूर्ण फैसला: रविंद्र उपाध्याय मामले में (2022)

  वर्ष 2018 में वर्धा पुलिस स्टेशन में रविंद्र उपाध्याय ने चर्चा की रिकॉर्डिंग की थी।

  पुलिस ने उन पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट लगाकर केस दर्ज किया।

  बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूरा केस रद्द कर दिया और कहा —

“धारा 2(8) में निषिद्ध स्थानों की परिभाषा विस्तृत है, लेकिन उसमें पुलिस स्टेशन शामिल नहीं है। इसलिए सामान्य रिकॉर्डिंग जासूसी नहीं मानी जा सकती।”

नागपुर पुलिस ने इस फैसले के बाद सभी थानों को सर्कुलर जारी किया कि नागरिकों को पुलिस स्टेशन के अंदर रिकॉर्डिंग करने से नहीं रोका जाए।

कानूनी आधार

  अनुच्छेद 19(1)(a) — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सूचना एकत्र करने और सार्वजनिक अधिकारियों को रिकॉर्ड करने का अधिकार शामिल है।

  अनुच्छेद 21 — जीवन और गरिमा का अधिकार (पुलिस अत्याचार से बचाव के लिए रिकॉर्डिंग वैध)।

  केरल पुलिस एक्ट 2011 की धारा 33(2) भी स्पष्ट कहती है कि पुलिस किसी नागरिक को सार्वजनिक या निजी जगह पर पुलिस की कार्रवाई रिकॉर्ड करने से नहीं रोक सकती, जब तक काम में बाधा न डाली जाए।

कब सावधानी बरतें?

रिकॉर्डिंग कानूनी है, लेकिन कुछ शर्तें हैं:

  पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी में बाधा न डालें (धारा 186 BNS/IPC)।

  लॉकअप, कंट्रोल रूम या संवेदनशील जांच जैसे क्षेत्रों में गोपनीय जानकारी रिकॉर्ड न करें।

  चुपके से रिकॉर्ड करने की बजाय शांतिपूर्वक और सम्मान से करें। अगर पुलिस रोकें तो politely बोले — “सर, बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार यह मेरे अधिकार में है।”

सलाह:

  रिकॉर्डिंग लाइव स्ट्रीम करें (फेसबुक/यूट्यूब) ताकि डिलीट न हो सके।

  क्लाउड बैकअप रखें।

  अगर मोबाइल छीन लें तो पूछें — “किस कानून के तहत?”

  अगर अधिकारों का उल्लंघन लगे तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

निष्कर्ष:

पुलिस स्टेशन अब कोई ‘ब्लैक बॉक्स’ नहीं रहा। नागरिकों का रिकॉर्डिंग का अधिकार पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। सुप्रीम कोर्ट भी सभी थानों में CCTV अनिवार्य कर चुका है, जो खुद पुलिस की जवाबदेही बढ़ाता है।

जानकारी के लिए: यह सामान्य कानूनी जागरूकता है। किसी विशिष्ट मामले में वकील से सलाह लें।

स्रोत: बॉम्बे हाईकोर्ट जजमेंट (रविंद्र उपाध्याय बनाम महाराष्ट्र राज्य), नागपुर पुलिस सर्कुलर, अनुच्छेद 19 एवं 21।

अपने अधिकार जानें, सम्मान से इस्तेमाल करें — यही लोकतंत्र की ताकत है।

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